Question:

‘तीसरी कसम’ जैसी साहित्यिक और कलात्मक फ़िल्मों की व्यावसायिक सफलता संदिग्ध क्यों हो जाती है?

Show Hint

कला और व्यापार के अलग-अलग उद्देश्यों से शुरू कीजिए, फिर दर्शक की पसंद, वितरक का जोखिम और प्रचार की कमी को कारण के रूप में लिखिए।
Updated On: Sep 15, 2026
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Solution and Explanation

Concept:
  • ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ पाठ में बताया गया है कि यह फ़िल्म कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट थी, फिर भी उसे वितरक नहीं मिले।
  • प्रश्न कारण पूछ रहा है, इसलिए उत्तर में व्यवसाय और कला के टकराव को स्पष्ट करना है।

Step 1: पहला कारण, दर्शक की आदत।
अधिकांश दर्शक फ़िल्म को केवल मनोरंजन का साधन मानते हैं। वे नाच-गाना, मारधाड़ और चमक-दमक देखना चाहते हैं।
साहित्यिक फ़िल्में इन सबसे दूर रहकर संवेदना और यथार्थ पर टिकी होती हैं, इसलिए वे भीड़ नहीं खींच पातीं।

Step 2: दूसरा कारण, वितरक और निर्माता का भय।
वितरक वही फ़िल्म लेना चाहता है जिसमें पैसा लौटने की गारंटी हो। कलात्मक फ़िल्म का परिणाम अनिश्चित रहता है, इसलिए उसे खरीदने से लोग कतराते हैं।
‘तीसरी कसम’ के साथ ठीक यही हुआ, उसे वितरक ही नहीं मिल रहे थे।

Step 3: तीसरा कारण, प्रचार और वितरण की कमी।
बड़ी फ़िल्मों की तरह इन फ़िल्मों का प्रचार नहीं होता और इन्हें अच्छे सिनेमाघर तथा अच्छा समय नहीं मिलता। दर्शक तक पहुँचने से पहले ही फ़िल्म पीछे रह जाती है।

Step 4: चौथा कारण, सफलता का पैमाना ही अलग है।
ऐसी फ़िल्में कला की कसौटी पर खरी उतरती हैं, कमाई की कसौटी पर नहीं। ‘तीसरी कसम’ को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक मिला, पर व्यावसायिक दृष्टि से उसे सफल नहीं कहा गया।

Final Answer: ऐसी फ़िल्मों की व्यावसायिक सफलता इसलिए संदिग्ध रहती है क्योंकि अधिकांश दर्शक केवल मनोरंजन चाहते हैं, वितरक जोखिम लेने से बचते हैं, प्रचार और अच्छे सिनेमाघर नहीं मिलते, और इन फ़िल्मों की असली कसौटी कमाई नहीं बल्कि कला होती है।
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