Concept:
- कबीर की साखियों का मूल स्वर यह है कि ईश्वर बाहर कहीं नहीं, भीतर ही है, पर हम उसे देख नहीं पाते।
- प्रश्न दो बातें माँगता है, बाधा कौन-सी है और वह बाधा क्यों है।
Step 1: बाधा का नाम बताइए।
कबीर के अनुसार प्रभु प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा
अहंकार अर्थात ‘मैं’ का भाव है।
Step 2: कबीर की पंक्ति से पुष्टि कीजिए।
वे कहते हैं कि जब तक ‘मैं’ था तब तक हरि नहीं थे, और अब हरि हैं तो ‘मैं’ नहीं रहा। अर्थात अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते।
दीपक जलते ही अँधेरा मिट जाता है, वैसे ही ज्ञान का प्रकाश आते ही अहंकार समाप्त हो जाता है।
Step 3: कारण बताइए कि यह सबसे बड़ी बाधा क्यों है।
अहंकार मनुष्य को यह भ्रम देता है कि वह स्वयं सब कुछ है। इस भ्रम में वह न किसी से सीखता है, न झुकता है, और न ही प्रेम कर पाता है।
भक्ति का मार्ग समर्पण का मार्ग है, और जो झुक ही न सके वह समर्पण नहीं कर सकता।
Step 4: निष्कर्ष लिखिए।
इसीलिए कबीर बार-बार अहंकार त्यागने पर बल देते हैं, क्योंकि जब तक ‘मैं’ भीतर बैठा है, ईश्वर के लिए स्थान ही नहीं बचता।
Final Answer: कबीर ने प्रभु प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा अहंकार अर्थात ‘मैं’ के भाव को बताया है। कारण यह है कि अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि अहंकारी व्यक्ति न झुक पाता है, न समर्पण कर पाता है, और भक्ति बिना समर्पण के संभव नहीं।