Concept:
- ‘गिन्नी का सोना’ यतीन्द्र मिश्र के निबंध-संग्रह का पाठ है, जिसमें शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने के रूपक से आदर्शवादी और व्यावहारिक लोगों की तुलना की गई है।
- प्रश्न कथन के पक्ष में विचार माँग रहा है, इसलिए उत्तर में समर्थन के तर्क देने हैं।
Step 1: पाठ का मूल रूपक समझाइए।
शुद्ध सोना अकेला नरम होता है, उसमें ताँबा मिलाने पर वह गिन्नी का सोना बनकर मजबूत हो जाता है। इसी तरह आदर्श में थोड़ी व्यावहारिकता मिलाने पर वह जीवन में चल पाता है।
Step 2: पहला पक्ष, आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा।
पाठ बताता है कि केवल आदर्श की बात करना काफी नहीं, उसे व्यवहार में लाना आवश्यक है। गांधी जी इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने व्यावहारिकता को पहचानते हुए भी अपने आदर्श नहीं छोड़े।
यही एक सक्रिय नागरिक का गुण है।
Step 3: दूसरा पक्ष, स्वार्थ और लाभ-हानि की सोच से बचने की सीख।
पाठ चेतावनी देता है कि जो लोग केवल लाभ-हानि देखकर चलते हैं, वे समाज को नीचे की ओर ले जाते हैं। यह पाठक को सचेत करता है कि वह अपने निर्णय केवल अपने फायदे से न ले।
Step 4: तीसरा पक्ष, समाज के प्रति उत्तरदायित्व।
पाठ यह भी सिखाता है कि आदर्श किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं होते, वे पूरे समाज को दिशा देते हैं। इस समझ से नागरिक अपने आसपास की समस्याओं के प्रति जागरूक और सक्रिय बनता है।
Final Answer: यह कथन सही है, क्योंकि पाठ सिखाता है कि आदर्शों को व्यवहार में उतारना चाहिए, केवल लाभ-हानि देखकर नहीं चलना चाहिए, और समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाना चाहिए। यही जागरूक और सक्रिय नागरिक के गुण हैं।