List of top Hindi Elective Questions on गद्यांश पर आधारित प्रश्न

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :

हालाँकि उसे खेती की हर बारीकी के बारे में मालूम था, लेकिन फिर भी डरा दिए जाने के कारण वह अकेला खेती करने का साहस न जुटा पाता था । इससे पहले वह शेर, चीते और मगरमच्छ के साथ साझे की खेती कर चुका था, अब उससे हाथी ने कहा कि अब वह उसके साथ साझे की खेती करे । किसान ने उसको बताया कि साझे में उसका कभी गुज़ारा नहीं होता और अकेले वह खेती कर नहीं सकता । इसलिए वह खेती करेगा ही नहीं । हाथी ने उसे बहुत देर तक पट्टी पढ़ाई और यह भी कहा कि उसके साथ साझे की खेती करने से यह लाभ होगा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर खेतों को नुकसान नहीं पहुँचा सकेंगे और खेती की अच्छी रखवाली हो जाएगी ।
किसान किसी न किसी तरह तैयार हो गया और उसने हाथी से मिलकर गन्ना बोया ।

समय पर जब गन्ने तैयार हो गए तो वह हाथी को खेत पर बुला लाया । किसान चाहता था कि फ़सल आधी-आधी बाँट ली जाए । जब उसने हाथी से यह बात कही तो हाथी काफ़ी बिगड़ा ।
हाथी ने कहा, “अपने और पराए की बात मत करो । यह छोटी बात है । हम दोनों ने मिलकर मेहनत की थी हम दोनों उसके स्वामी हैं । आओ, हम मिलकर गन्ने खाएँ ।”
किसान के कुछ कहने से पहले ही हाथी ने बढ़कर अपनी सूँड से एक गन्ना तोड़ लिया और आदमी से कहा, “आओ खाएँ ।”
गन्ने का एक छोर हाथी की सूँड में था और दूसरा आदमी के मुँह में । गन्ने के साथ-साथ आदमी हाथी के मुँह की तरफ़ खिंचने लगा तो उसने गन्ना छोड़ दिया ।
हाथी ने कहा, “देखो, हमने एक गन्ना खा लिया ।”
इसी तरह हाथी और आदमी के बीच साझे की खेती बँट गई ।
 

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

भारत और अफ्रीका के अधिकांश इलाकों को यदि छोड़ दें तो समूची दुनिया बुढ़ापे की ओर बढ़ चली है। जैसे-जैसे दुनिया बूढ़ी होती जा रही है श्रम बल की भयंकर कमी का सामना करने लगी है, यहाँ तक कि उत्पादकता में भी कमी आने लगी है। ऐसे में 'सिल्वर जेनरेशन (रजत पीढ़ी) एक बहुमूल्य जनसांख्यिकीय समूह साबित हो सकती है। इससे न सिर्फ मौजूदा चुनौतियों से पार पाने में मदद मिलेगी, बल्कि समाज के कामकाज का तरीका भी बदल सकता है। विश्व के कई देशों में नए उद्यमियों का बड़ा हिस्सा इसी रजत पीढ़ी का है और कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के कार्य-बल में इनकी हिस्सेदारी काफी बढ़ गई है। ऐसे में, सरकारों और कंपनियों को मिलकर आधुनिक कार्य-बल में 'उम्रदराज’ लोगों को शामिल करने पर जोर देना चाहिए।

बेशक उम्र के अंतर को पाटने के लिए प्रवासन को बतौर निदान पेश किया जाता है, पर यह तरीका अब राजनीतिक मसला बनने लगा है और अपनी लोकप्रियता भी खोता जा रहा है । इसीलिए, सरकारों को रजत पीढ़ी की ओर सोचना चाहिए। कई अध्ययनों से पता चलता है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी बुजुर्ग काम के योग्य होते हैं या उचित अवसर मिलने पर काम पर लौट आते हैं । इनके अनुभवों का बेहतर उपयोग हो सके, इसके लिए नियोक्ताओं और सरकारों को मिलकर काम करना चाहिए । रजत पीढ़ी को प्रभावी रूप से योगदान देने के लिए सशक्त और प्रशिक्षित किया जाए।

कारोबारी लाभ के अतिरिक्त, इसके सामाजिक लाभ भी हैं, जैसे वृद्ध लोगों का स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कम होता है | जो दिमाग सक्रिय रहता है, वह समस्याओं को सुलझाने और दूसरों के साथ बातचीत करने का आदी होता है, जिसका कारण उसका क्षय तुलनात्मक रूप से धीमा होता है । सेहतमंद बने रहने की भावना शरीर पर भी सकारात्मक असर डालती है और बाहरी मदद की जरूरत कम पड़ती है।

रजत पीढ़ी का ज्ञान और अनुभव अर्थव्यवस्था को नए कारोबार स्थापित करने, नई चीजें सीखने और दूसरे करियर को अपनाने के अनुकूल बनाता है । जैसे-जैसे जन्म-दर में गिरावट आ रही है, कार्य-बल की दरकार दुनिया को होने लगी है और इसका एकमात्र विकल्प रजत पीढ़ी के जनसांख्यिकीय लाभांश पर भरोसा करना है ।
 

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :
“नहीं मायाजी! ज़मीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है। टूट भी गई है, है तो आखिर बड़ी हवेली ही। ‘समाँन’ नहीं है, वह बात ठीक है। मगर, बड़ी बुढ़िया का तो सारा गाँव ही परिवार है। हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बुढ़िया। ... गाँव की लक्ष्मी गाँव को छोड़कर शहर कैसे जाएगी? अरे, देवर लोग हर बार आकर ले जाने की ज़िद करते हैं।”
बूढ़ी माता ने अपने हाथ हरगोबिन को जलपान लाकर दिया, “पहले थोड़ा जलपान कर लो, बबुआ!”
जलपान करते समय हरगोबिन को लगा, बड़ी बुढ़िया दालान पर बैठी उसकी राह देख रही है — भूखी-प्यासी...। रात में भोजन करते समय भी बड़ी बुढ़िया मानो सामने आकर बैठ गई... कर्ज़-उधार अब कोई देता नहीं... एक पेट तो करना भी पालता है, लेकिन मैं?... माँ से कहना...!
हरगोबिन ने थाली की ओर देखा — दाल-भात, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़, अचार... बड़ी बुढ़िया बख्शा-साग़ा खलाकर खा रही होगी।
बूढ़ी माता ने कहा, “क्यों बबुआ, खाते क्यों नहीं?”
“मायाजी, पेटभर जलपान जो कर लिया है।”
“अरे, जवान आदमी तो पाँच बार जलपान करके भी एक थाल भात खाता है।”
हरगोबिन ने कुछ नहीं खाया। खाया नहीं गया।
संवेदना टकरा उठता है जैसे ‘अफर’ कर लेता है, किंतु हरगोबिन को नींद नहीं आ रही है... वह उसने क्या किया? क्या कर दिया? वह किसलिए आया था? वह खुद क्यों बोलता?... नहीं, नहीं, सुबह उठते ही वह बूढ़ी माता से बड़ी बुढ़िया को न भेजे जाने की सिफारिश करेगा... अक्षर-अक्षर॥
 

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
डिजिटल अरेस्ट (केंद्रीय मनोवैज्ञानिक भयादोहन - ब्लैकमेल) का सबसे नया तरीका है। इसमें साइबर अपराधी तकनीक की मदद से लोगों को कैदी बनाने लगे हैं। वे आपकी निजी जानकारी हासिल कर या किसी झूठे मामले का ज़िक्र कर आपको इस बुरी तरह से ब्लैकमेल करते हैं कि आप अपनी सहज-विवेक शक्ति ही भुला बैठते हैं। मनुष्य के मन पर क़ब्ज़ा इस अपराध का सबसे प्रबल पक्ष है।
आज के समय में किशोर से लेकर वृद्ध तक, हर कोई डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर रहा है। इसीलिए साइबर अपराधियों का काम आसान हो गया है। डिजिटल केंद्र में किसी भी व्यक्ति को ऑनलाइन माध्यम से डरा जाता है कि वह सरकारी एजेंसी के माध्यम से कैद हो गया है, उसे जुर्माना देना होगा। लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी एजेंसियाँ ऑनलाइन तरीके से नहीं, भौतिक तरीके से ही पूछताछ करती हैं। बार-बार विभिन्न तरीकों के माध्यम से लोगों को जागरूक भी किया जाता है कि अपने बैंक खातों की गोपनीय जानकारी या ओटीपी किसी को न दें लेकिन लोग इस ओर ध्यान न देकर ये जानकारी उन्हें सौंप देते हैं और धोखा खाते हैं।
साइबर अपराध के लिए हेल्पलाइन नंबर या ई-मेल के ज़रिए शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा, स्थानीय पुलिस को तुरंत सूचना देकर भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। सरकार ने ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए संचार सुरक्षा वेबसाइट 'साइबर पोर्टल' को लॉन्च किया गया है।
बदलते दौर में सतर्क रहने की ज़रूरत है। अगर कोई अजनबी व्यक्ति आपको व्हाट्सएप पर किसी ग्रुप में जोड़े या फेसबुक पर लालच देकर किसी पेज को पसंद करने को कहे तो ऐसा नहीं करना चाहिए। यूट्यूब पर दिए गए नंबरों पर कॉल नहीं करना चाहिए, किसी अजनान लिंक पर क्लिक नहीं करना चाहिए। पैसा कमाने के शॉर्टकट तरीकों से बचना चाहिए। समय के साथ समझदारी और सतर्कता से ही इस अपराध से बचा जा सकता है।
 

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :
मैं तो शहर से या आदमियों से डरकर जंगल इसलिए भागा था कि मेरे सिर पर सींग निकल रहे थे और डर था कि किसी-न-किसी दिन किसी की नज़र मुझ पर ज़रूर पड़ जाएगी।
जंगल में मेरा पहला ही दिन था जब मैंने बरगद के पेड़ के नीचे एक शेर को बैठे हुए देखा। शेर का मुँह खुला हुआ था। शेर का खुला मुँह देखकर मेरा जो हाल होना था वही हुआ, यानी मैं डर के मारे एक झाड़ी के पीछे छिप गया।
मैंने देखा कि झाड़ी की ओट भी ग़ज़ब की चीज़ है। अगर झाड़ियाँ न हों तो शेर का मुँह-ही-मुँह हो और फिर उससे बच पाना कठिन हो जाए। कुछ देर बाद मैंने देखा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर एक लाइन से चले आ रहे हैं और शेर के मुँह में घुसे चले जा रहे हैं। शेर बिना हिले-डुले, बिना चबाए, जानवरों को गटकता जा रहा है। यह दृश्य देखकर मैं बेहोश होते-होते बचा।
 

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिएः
भारतीय कला में लोक भी है और शास्त्र भी। भारतीय लोक कला की दृष्टि यह है कि उसके दृष्टिपथ से कुछ छूटे नहीं, यही दृष्टि भारत के लोक काव्य की भी है। जो कुछ लोक ने कहा, अनुभव किया वह कला हो गया। इसी अनुभव ने जब तल्ख़ा पकने तो मांडने बन गए, घोटे बन गए और लोक के तमाम देवी-देवता अपने लोक रंग के साथ घरों की भित्तियों पर विराज गए। सब एक ही धारातल से उपजे हैं चाहे वह लोक हो, चाहे शास्त्र हो या उसकी कला। इन तीनों में कहीं द्वंद नहीं है। लोक और शास्त्र में विरोध का इसलिए प्रश्न नहीं है क्योंकि शास्त्र लोक की ही देन है और यही स्थिति कला की भी है।
भारतीय कला को लेकर प्रायः यह कहा जाता है कि भारतीय कला विशेष रूप से मध्यकालीन कला लोक का प्रतिनिधित्व नहीं करती, लेकिन यह सत्य नहीं है। राज्याश्रयी चित्रों और शिल्पियों ने भी अपने लोक को रचा है। उन संरक्षकों ने भी अपने लोक की सर्जना अपने अंकों में की जो विहारों में रहते थे। लोक के रंग का कोई वर्जित नहीं रहा। चाहे अजन्ता हो, खजुराहो हो या माउट आभू पर बनी मंदिर शृंखला, इन सभी में लोक का अंकन है। माउट आभू में एक मंदिर ऐसा भी है जहाँ शिल्पियों ने अपने धन और अपने श्रम से बनाय। जहाँ खजुराहो के अन्य भित्तिचित्रों पर लोक व्यापार के अंकन वहाँ के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंकन हैं। खजुराहो के शिल्पों में भी अधिकांश शिल्प लोक व्यापार के शिल्प हैं।
भारतीय कला का उद्गम अनादि है। आदि ग्रंथों में इसके प्रमाण हैं और फिर इसकी निरंतरता कभी विराम नहीं लेती। संदर्भ तो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक रचे गए ग्रंथों में हैं। कालक्रम की दृष्टि से यदि देखा जाए तो भीमबेटका की गुफाओं में दस हजार वर्ष पूर्व किए गए आदिमानव के अंकों से लेकर छठीं की दूसरी सदी में हुए शुंग कला के समय के अश्वमेध के घोड़े का अंकन मौजूद है।
सार रूप में कहा जा सकता है कि भारत में लोक ने पृथक रूप से उपस्थित रहकर अपना अस्तित्व रचने वाली ऐसी कोई शिल्पकला, स्थापत्य अथवा चित्रांकन की परंपरा नहीं रहने दी, जिसमें लोक छूट गया हो।
 

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ? 
पदार्थ सामने है, पद नहीं सूझ रहा है। 
मन व्याकुल हो गया। 
स्मृतियों के पंख फैलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झाँकता रहा। 
सोचता हूँ इसमें व्याकुल होने की क्या बात है? 
नाम में क्या रखा है – 'बाह्यद देस्सर इन द नेम'! 
नाम की ज़रूरत ही हो तो सौ दिए जा सकते हैं। 
सुस्मिता, गिरिकांता धरतीधकेल, पहाड़फोड़, पातालभेद! 
पर मन नहीं मानता। 
नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है। 
वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। 
रूप व्यक्ति सत्य है, नाम समाज सत्य। 
नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। 
आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सेन्शन’ कहते हैं।

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : बड़ी बहुरिया के संवाद का प्रत्येक शब्द उसके मन में काँटे की तरह चुभ रहा है -- 
'किसके भरोसे यहाँ हूँगी? एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। 
गाय खूंटे से बंधी भूखी-प्यासी हिनक रही है। 
मैं किसके लिए इतना दुख झेलूँ?' हरगोबिन ने अपने पास बैठे हुए एक यात्री से पूछा, 
‘क्यों भाई साहेब, थाना विंधपुर में डाकगाड़ी रुकती है या नहीं?’ यात्री ने मानो कुकुरकर कहा, “थाना विंधपुर में सभी गाड़ियाँ रुकती हैं।” हरगोबिन ने भाँप लिया, यह आदमी चिड़चिड़े स्वभाव का है, इससे कोई बातचीत नहीं जमेगी। 
वह फिर बड़ी बहुरिया के संवाद को मन-ही-मन दोहराने लगा लेकिन, संवाद सुनाते समय वह अपने क्लेशों को कैसे संभाल सकेगा! 
बड़ी बहुरिया संवाद कहते समय जहाँ-जहाँ रोई है, वहाँ वह रोयेगा।

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :

एक मिल मालिक के दिमाग में अजीब-अजीब ख़याल आया करते थे जैसे सारा संसार मिल हो जाएगा,
सारे लोग मज़दूर और वह उनका मालिक या मिल में और चीज़ों की तरह आदमी भी बनने लगेंगे,
तब मज़दूरी भी नहीं देनी पड़ेगी, बोरों-बोरों।
एक दिन उसके दिमाग में ख़याल आया कि अगर मज़दूरी के चार हाथ हो तो काम कितना तेज़ हो
और मुनाफ़ा कितना ज़्यादा। लेकिन यह काम करेगा कौन?

उसने सोचा, वैज्ञानिक करेंगे, ये किस मर्ज़ की दवा?
उसने यह काम करने के लिए बड़े वैज्ञानिकों को मोटी तनख्वाह पर नौकर रखा और वे नौकर भी बने।
कई साल तक शोध और प्रयोग करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा कि ऐसा असंभव है कि आदमी के चार हाथ हो जाएँ।
मिल मालिक वैज्ञानिकों से नाराज़ हो गया।
उसने उन्हें नौकरी से निकाल दिया और अपने-आप इस काम को पूरा करने के लिए जुट गया।
 

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

जंगल मूल रूप से पेड़-पौधों की विभिन्न प्रजातियों से आच्छादित भूमि का एक टुकड़ा है।
प्रकृति की ये खूबसूरत रचनाएँ विभिन्न प्रजाति के जीव-जन्तुओं के लिए घर का काम करती हैं।
वन पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
दुर्भाग्य से शीतलता और हरियाली के प्रतीक माने जाने वाले ये जंगल पूरे विश्व में इन दिनों धधक रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि दावानल की घटनाएँ पहले नहीं होती थीं लेकिन वर्तमान में ये समस्या विकराल रूप में सामने आने लगी है।
इसकी कुछ खास वजह हैं।

पहली वजह, जलवायु परिवर्तन के कारण 'ड्राई पीरियड' यानी सूखे की अवधि बढ़ गई है।
तापमान बढ़ रहा है जिसके कारण गर्मी बढ़ रही है।
नतीजन जंगलों में सूखी पत्तियाँ या टहनियाँ आसानी से दहक उठती हैं।
दूसरी वजह है कि 1000 मीटर की ऊँचाई से ऊपर हरे पेड़ों की व्यावसायिक रूप से कटाई प्रतिबंधित कर दी गई।
इसका नुकसान यह हुआ कि चीड़ के पेड़ों की संख्या असामान्य हो गई।
चीड़ दरअसल ऐसा पेड़ है जो आग बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
मार्च-अप्रैल से चीड़ की पत्तियाँ सूखकर नीचे गिरने लगती हैं और तापमान में वृद्धि होने पर आग के फैलाव का एक बड़ा कारण बनती है।

तीसरी वजह है, जंगलों से लोगों का रिश्ता खत्म हो रहा है।
पहले लोगों का अपने आसपास के जंगलों से जीवंत रिश्ता होता था।
वे वनोपज से अपना गुज़ारा करते थे इसके बदले में जंगलों का प्रबंधन किया करते थे।
लेकिन अब लोगों ने खुद को इससे अलग कर लिया।
इसके कारण वन बढ़ते हुए गाँवों तक पहुँच गए, जो दावानल की चौथी वजह है।
अब अक़्सर वे पहाड़ी गाँवों में लोग रहते नहीं, और जो रहते हैं उनके घरों में ईंधन संबंधी, ऊर्जा संबंधी सुविधाएँ बढ़ने से जंगलों पर उनकी निर्भरता कम होने लगी है।
नतीजतन वे वन को नियंत्रित करने में खास रुचि नहीं रखते।

इस समस्या के समाधान के लिए मज़बूत इच्छाशक्ति के साथ सामूहिक रूप से सही दिशा में कदम उठाना होगा।
 

शिवालिक की सूखी नीसर पहाड़ियों पर मुस्कुराते हुए ये वृक्ष खड़ेताली हैं, अलमस्त हैं~। 
मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता, शील नहीं जानता पर लगता है, 
ये जैसे मुझे अनादि काल से जानते हैं~। 
इनमें से एक छोटा-सा, बहुत ही भोला पेड़ है, पत्ते छोटे भी हैं, बड़े भी हैं~। 
फूलों से तो ऐसा लगता है कि कुछ पूछते रहते हैं~। 
अनजाने की आदत है, मुस्कुराना जान पड़ता है~। 
मन ही मन ऐसा लगता है कि क्या मुझे भी इन्हें पहचानता~? 
पहचानता तो हूँ, अथवा वहम है~। 
लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ~। 
पहचानता हूँ~। 
उजाले के साथ, मुझे उसकी छाया पहचानती है~। 
नाम भूल जाता हूँ~। 
प्रायः भूल जाता हूँ~। 
रूप देखकर सोच: पहचान जाता हूँ, नाम नहीं आता~। 
पर नाम ऐसा है कि जब वह पेड़ के पहले ही हाज़िर हो ले जाए तब तक का रूप की पहचान अपूर्ण रह जाती है।

बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है~। 
जहाँ दिनभर नौकर-नौकरानियाँ और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी, 
वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूखा में अनाज लेकर फटक रही है~। 
इन हाथों से सिर्फ़ मेंहदी लगाकर ही गाँव नाइन परिवार पालती थी~। 
कहाँ गए वे दिन~? हरगोबिन ने लंबी साँस ली~। बड़े बैसा के मरने के बाद ही तीनों भाइयों ने आपस में लड़ाई-झगड़ा शुरू किया~। 
देवता ने जमीन पर दावे करके दबाव किया, फिर तीनों भाई गाँव छोड़कर शहर में जा बसे, 
रह गई बड़ी बहुरिया — कहाँ जाती बेचारी~! भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते हैं~। 
नहीं तो पट्टे की बीघा में बड़े बैसा क्यों मरते~? 
बड़ी बहुरिया की देह से जेवर खींच-खींचकर बँटवारे की लालच पूरी हुई~। 
हरगोबिन ने देखती हुई आँखों से दीवार तोड़-झरोन लोहा 
बनारसी साड़ी को तीन टुकड़े करके बँटवारा किया था, निर्दय भाइयों ने~। 
बेचारी बड़ी बहुरिया~!

कहीं-कहीं अज्ञात नाम-गोत्र झाड़-झंखाड़ और बेहया-से पेड़ खड़े अवश्य दिख जाते हैं पर और कोई हरियाली नहीं~। 
दूर तक सूख गई है~। काली-काली चट्टानों और बीच-बीच में शुष्कता की अंतरिक्षध सत्ता का इज़हार करने वाली रक्तिमा देती~! 
रस कहाँ है~? ये जो ठिगने से लेकिन शानदार दरख़्त गर्मी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं, 
इन्हें क्या कहूँ~? सिर्फ़ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं~। बेहया हैं क्या~? या मस्तमोला हैं~? 
कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी, पैठी रहती हैं~। 
ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गहराव से अपना भोग्य खींच लाते हैं~।

हरगोबिन को अचरज हुआ -- तो आज भी किसी को संदेसिया की ज़रूरत पड़ सकती है~। 
इस ज़माने में जबकि गाँव-गाँव में डाकघर खुल गए हैं, संदेसिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई~? 
आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहाँ का कुशल संवाद माँग सकता है~। 
फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई~? हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी झरोखी पारकर अंदर गया~। 
सदा की भाँति उसने वातावरण को सूँघकर संवाद का अंदाज़ लगाया~। 
निश्चित ही कोई गुप्त समाचार ले जाना है~। 
चाँद-सूरज को भी नहीं मालूम हो~। 
पेवो-पंछी तक न जाने~। “पाँव लागी, बड़ी बहुरिया~!” बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आँख के इशारे से कुछ देर चुपचाप बैठने को कहा~। 
बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है~। 
जहाँ दिनभर नौकर-नौकरानियाँ और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूखा में अनाज लेकर फटक रही है~।

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर के लिए उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए :

मेरे पिताजी फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिंदी कविता के बड़े प्रेमी थे। फ़ारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में उन्हें बड़ा आनंद आता था। वे रात को प्रायः रामचरितमानस और रामचंद्रिका, घर के सब लोगों को एकत्र करके बड़े चिन्ताशील ढंग से पढ़ा करते थे। आधुनिक हिंदी-साहित्य में भारतेंदु जी के नाटक उन्हें बहुत प्रिय थे। उन्हें भी वे कभी-कभी सुनाया करते थे। जब उनकी बदली हमीरपुर ज़िले की राठ तहसील से मिर्जापुर हुई तब मेरी अवस्था आठ वर्ष की थी। उसके पहले ही से भारतेंदु के संबंध में एक अनुपम मधुर भावना मेरे मन में जगी रहती थी। 'सत्य हरिश्चंद्र' नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि हरिश्चंद्र में मेरी बाल–बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी।
 

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिस पर जीवन संभव है। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को बचाने के संकल्प के साथ ‘पृथ्वी दिवस’ हर साल 22 अप्रैल को दुनिया भर में मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत 1970 में हुई जब अमेरिकी सांसदों तक बढ़ते प्रदूषण की बिगड़ती पर्यावरण के मुद्दे की गंभीरता को समझा और पृथ्वी बचाने के लिए एक अभियान की शुरुआत हुई। उस कार्यक्रम में देखे आंकड़े, जैसे ऑक्सीजन के स्तर में गिरावट तथा जल, वायु और मृदा प्रदूषण आदि पर्यावरण के आने वाले विनाशकारी स्वरूप को दर्शाते हैं, जिसमें प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग प्लास्टिक को समाप्त करने और प्राकृतिक बचाव का आह्वान करता है।

कहते हैं जैसे-जैसे आत्मकेंद्रितता बढ़ रही है, प्रकृति और पर्यावरण के दोहन की गति भी बढ़ती जा रही है। बढ़ते अंधविकास के कारण वह दिन बहुत दूर नहीं, जब पृथ्वी रहने लायक नहीं बचेगी।

हमने। वास्तव में हम ही हैं जो सभी जगह जा सकते, अनुभव–अनुभूति विनिमयहीनता की समझ और पृथ्वी के प्रति अपने कर्तव्यों द्वारा। गान्धीजी का मानना था कि पृथ्वी, जल, वायु और भूमि हमारे पूर्वजों की संपत्ति नहीं हैं, जिन्हें हम अपने मनमाने और निजी फायदे की अपेक्षा में खो दें। हमें अपने पूर्वजों की संपत्ति अपने बच्चों–बच्चों तक पहुँचानी होती है। गांधीजी का कथन था कि पृथ्वी के पास लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन लोभ के लिए नहीं।

आज पारंपरिक मान्यता है कि पृथ्वी एक जीवंत इकाई है, इसका समस्त रूप, जलवायु, जीवन–जंतु इसके जीवंत होने की पुष्टि करते हैं। भौगोलिक स्थिति की दृष्टि से स्पष्ट है कि पृथ्वी प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार है। इसका कोई विकल्प नहीं। इसीलिए 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाना तभी सार्थक है जब हम संकल्प लें कि इस दिशा में संजीदगी से सोचें और कार्य करें। प्रकृति को सौंदर्य का साधन न बनाएं बल्कि जीवन रक्षक आधार मानें। इसके लिए हमें सामूहिक चेतना, प्रयास और संकल्प की दिशा में जीवन को नए सिरे से सजाना होगा।

 

गद्यांश के आधार पर दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :

मैं तो शहर से या आदमियों से डरकर जंगल इसलिए भागा था कि मेरे सिर पर सींग निकल रहे थे और डर था कि किसी-न-किसी दिन किसी की नज़र मुझ पर ज़रूर पड़ जाएगी।
जंगल में मेरा पहला ही दिन था जब मैंने बबूल के पेड़ के नीचे एक शेर को बैठे हुए देखा। शेर का मुँह खुला हुआ था। शेर का खुला मुँह देखकर मेरा जो हाल होना था वही हुआ, यानी मैं डर के मारे एक झाड़ी के पीछे छिप गया।
मैंने देखा कि झाड़ी की ओट भी ग़ज़ब की चीज़ है। अगर झाड़ी न होती तो न शेर का मुँह-खुला और न ही उसमें डर पाना संभव हो पाता।
कुछ देर बाद मैंने देखा कि जंगल के छोटे-छोटे जानवर एक लाइन से चले आ रहे हैं और शेर के मुँह में घुसे चले जा रहे हैं। यह बिना हिले-डुले, बिना बवाल, जानवरों की ग़ज़ब की ग़ज़ल लग रही है। यह दृश्य देखकर मैं हैरान हो गया।

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

मन और मस्तिष्क में अंतर है। मस्तिष्क में अगणित चेतना की तरंगें उठती रहती हैं। मन उन तरंगों का समुच्चय (संग्रह) है। मन को विद्वानों ने तीन मंज़िला भवन – नववकल्प, वस्तलस और सरल माना है जिनमें भाव उठते हैं और संवेदनात्मक प्रक्रिया में विकसित होते हैं, फिर क्रियात्मक रूप धारण करते हैं। 
डॉ. रघुवंश ने अपनी अंगत्ता को संवेदनात्मक सुसंस्कार प्रदान की और भक्ति में सुंदरता से यह सुनिश्चित किया कि यह अंगत्ता उनके जीवन के किसी कार्य में बाधक नहीं होगी। 
जीवन भर, उनके मन की सूक्ष्मता कायम रही और वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। अपने हाथों के न होने को अपनी अक्षमता नहीं माना बल्कि व्यावहारिक योग्यताओं से पैरों से ही लिखने का अभ्यास किया और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते गए। उनका नवर उत्साह से भरा मन हमेशा लेखन कार्य, सेवा कार्य में संलग्न रहा। 
हर प्रकार की स्वच्छता की भावना उनके स्वभाव का अभिन्न अंग रही है। बहुत से लोगों में यह स्वच्छता बाह्य रूप में ही मिलती है, पर डॉ. रघुवंश बाह्य और आंतरिक रूप में भी स्वच्छ हैं, अर्थ संबंधी मामलों में भी स्वच्छ हैं जो आजकल कम ही दिखाई देता है। 
किसी युक्ति से वह दिखाने में बैठे हुए उस चालक की देय राशि निकालकर रख लेते हैं, यह विश्वसनीयता है जिसमें उनका ले जाने वाला व्यक्ति अपने पास से रुपये न दे। 
उनके रहन-सहन व व्यक्तिगत जीवन में जितनी स्वच्छता मिलती है, उसका स्पष्ट प्रभाव उनके द्वारा संपादित कार्यों में परिलक्षित होता है। 
यह सब कुछ संभव हो पाने के पीछे उनका मजबूत मन तो है ही, साथ ही वह संकल्प शक्ति भी है जिसे विज्ञान ने मन का लक्षण कहा है और जिसे उन्होंने स्वयं ही धारण कर ली थी क्योंकि मन ही तो संकल्पात्मक होता है। 
संकल्प ही क्रिया है। संकल्प ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा है।