List of top Hindi Elective Questions on काव्यांश पर आधारित प्रश्न

निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

कुछ लोग हमारे पड़ोसी भी थे
और हम भी थे किसी के पड़ोसी
अब जाकर यह ख्याल आता है।

``पड़ोसियों को कह कर आए हैं दो-चार दिन घर देख लेना''
यह वाक्य कहे-सुने अब एक अरसा हुआ है।

हथौड़ी कुदाल कुएँ से बाल्टी निकालने वाला
लोहे का काँटा, दतुवन, नमक हल्दी, सलाई
एक-दूसरे से ले-देकर लोगों ने निभाया है
लंबे समय तक पड़ोसी होने का धर्म

धीरे-धीरे लोगों ने समेटना कब शुरू कर दिया खुद को,
यह ठीक-ठीक याद नहीं आता
अब इन चीज़ों के लिए कोई पड़ोसियों के पास नहीं जाता

याद में शादी-ब्याह का वह दौर भी कौतूहल से भर देता है
जब पड़ोसियों से ही नहीं पूरे गाँव से
कुर्सियाँ और लकड़ी की चौकियाँ तक
बारातियों के लिए जुटाई जाती थीं

और लोग सौंपते हुए कहते थे -
बस ज़रा एहतियात से ले जाइएगा!

बस अब इस नई जीवन शैली में
हमें पड़ोसियों के बारे में कुछ पता नहीं होता
कैसी है उनकी दिनचर्या और उनके बच्चे कहाँ पढ़ते हैं?
वह स्त्री जो बीमार-सी दिखती है, उसे हुआ क्या है?
किसके जीवन में क्या चल रहा है?
कौन कितनी मुश्किलों में है?

हमने एक ऐसी दुनिया रची है
जिसमें खत्म होता जा रहा है हमारा पड़ोस।
 

निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

मैं किसी पर भरोसा करना चाहती हूँ
भरोसा करने के बाद चीज़ें बदल जाती हैं
जैसे कि यह मेज़
जो पहले मुझे ऊँची और खुदगर्ज़ी लगती थी
पर अब मैं इस पर घंटों काम कर सकती हूँ।

तार पर सूखते कपड़े उतारते समय
बरामदे से जो दृश्य दीखता है
उसमें से आती शाम
अधिक हरी होकर आती है
साफ़ और नए लगते हैं उसके कपड़े
जैसे वह कहीं घूमने जा रही हो

स्वप्न में अक्सर
इम्तिहान का कमरा और रेलवे प्लेटफॉर्म
आते थे

गणित, भौतिकशास्त्र और अंग्रेज़ी के पर्चे
ख़राब हो जाते थे
प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते ही छूट जाती थी रेल
पर अब ऐसा नहीं होता

काम समय पर होते हैं कुछ नहीं भी होते
सब कुछ मगर उतना निराशाजनक नहीं
लगता

अब जबकि
दुनिया एक गाँव बनने जा रही है
और एक विश्व बाज़ार है जिसमें
हम सब बिला जाएँगे

कितना जोखिम भरा शब्द हो गया है भरोसा
और उससे भी बड़ा जोखिम है उसे बचाना
क्योंकि वही बदलता है चीज़ों को
वही बचाता है स्मृतियों को
 

निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
वृद्धाएँ धरती का नमक हैं,
किसी ने कहा था!
जो घर में हो कोई वृद्धा –
खाना ज्यादा अच्छा पकता है,
परदे-पेटिकोट और पायजामे भी दर्जी और
फ़ूफ़ाओं के
मुहताज नहीं रहते,
सजा-धजा रहता है घर का हर कमरा,
बच्चे ज़्यादा अच्छा पलते हैं,
उनकी नन्हीं-मुन्नी उल्टियाँ सँभालती
जगती हैं वे रात-भर,
घुल जाती हैं बच्चों के सपनों में
हिमालय-विमालय की अटल कंदराओं की
दिव्यवर्णी-दिव्यगंधी जड़ी-बूटियाँ और
फूल-वूल!
उनके ही संग-साथ से भाषा में बच्चों की
आ जाती है एक अनजव कोंपल
मुहावरों, मिथकों, लोकोक्तियों,
लोकगीतों, लोकगाथाओं और कथा-समयों की।
उनके ही दम से
अतल कूप खुद जाते हैं बच्चों के मन में
आदिम स्मृतियों के।
रहती हैं बुढ़ुआँ, घर में रहती हैं
लेकिन ऐसे जैसे अपने होने की खातिर हों
क्षमाप्रार्थी
– लोगों के आते ही बैठक से उठ जातीं,
छुप-छुपकर रहती हैं छाया-सी, माया-सी!
पति-पत्नी जब भी लड़ते हैं उनको लेकर
कि तुम्हारी माँ ने दिया क्या, किया क्या–
कुछ देर वे करती हैं अनसुना,
कोशिश करती हैं कुछ पढ़ने की,
बाद में टहलने लगती हैं,
और सोचती हैं बेचैनी से – ‘गाँव गए बहुत दिन हुए!’
उनके बस यह सोचने-भर से
जादू से घर में सब हो जाता है ठीक-ठाक,
सब कहते हैं, ‘अरे, अभी कहाँ जाओगी,
अभी तो नहीं जाना है बाहर, बच्चों को रखेगा
कौन?’
कपड़ों की छाती जब फटती है –
खुल जाती है उनकी उपयोगिता।
 

निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

जहाँ भूमि पर पड़ा कि 
सोना धँसता, चाँदी धँसती 
धँसती ही जाती पृथ्वी में 
बड़ों–बड़ों की हस्ती। 

शक्तिवान जो हुआ कि 
बैठा भू पर आसन मारे 
खा जाते हैं उसको 
मिट्टी के ढेले हत्यारे। 

मातृभूमि है उसकी, जिसका 
उठके जीना होता है, 
दहन–भूमि है उसकी, जो 
क्षण–क्षण गिरता जाता है, 
भूमि खींचती है मुझको भी 
नीचे धीरे–धीरे 
किंतु लहराता हूँ मैं नभ पर 
शीतल–मंद–समीर। 

काला बादल आता है 
गुरु गर्जन स्वर भरता है 
विद्रोही–मस्तक पर वह 
अभिषेक किया करता है। 
विद्रोही हैं हमीं, हमारे 
फूलों से फल आते हैं 
और हमारी कुरबानी पर 
जड़ भी जीवन पाते हैं। 
 

निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

यह हार एक विराम है 
जीवन महासंग्राम है 
तिल-तिल बिंधूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं 
वरदान माँगूँगा नहीं। 

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए 
अपने खंडहरों के लिए 
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं 
वरदान माँगूँगा नहीं। 

क्या हार में क्या जीत में 
किंचित नहीं भयभीत मैं 
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही 
वरदान माँगूँगा नहीं। 

लघुता न अब मेरी छुओ 
तुम हो महान बने रहो 
अपने हृदय की वेदना मैं त्यागूँगा नहीं 
वरदान माँगूँगा नहीं। 

चाहे हृदय को ताप दो 
चाहे मुझे अभिशाप दो 
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं 
वरदान माँगूँगा नहीं।