विस्थापन से पूर्व वे कैसे परिवेश में रहते होंगे, किस तरह की ज़िंदगी बिताते होंगे, इसका दृश्य अपने स्वच्छ, पवित्र खुलपन में पहली बार अमसर गाँव में देखने को मिला।
पेड़ों के घने झुरमुट, साफ-सुथरे खपरैल लगी मिट्टी के झोंपड़े और पानी।
चारों तरफ़ पानी।
अगर मोटर-रोड की भागती बस की खिड़की से देखा, तो लोगों जैसे सपनों में डूबा झील है, एक अंतहीन सागर, जिसमें पेड़, झोंपड़े, आदमी, ढोर-डंगर आधे पानी में, आधे ऊपर तिरते दिखाई देते हैं, मानो किसी बाढ़ में सब कुछ डूब गया हो, पानी में जम गया हो।
फिर यह सच है... यह बाढ़ नहीं, पानी में डूबे बान के खेत हैं।
अगर बस थोड़ी सी हिम्मत दिखाकर गाँव के भीतर चले, तब वे औरतें दिखाई देंगी जो एक पांत में झुकी हुई धान के पौधे छप-छप पानी में रोप रही हैं।