List of top Hindi Elective Questions on हिंदी साहित्य asked in CBSE CLASS XII

बलीहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कृश यमराज के दाँतों निःश्वास के समान धधकती लू में भी यह हरा भी है और भरा भी है, दुःख के चिन्तन से भी अधिक करुणा की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरसते रस कीचक सरस बना हुआ है। 
और सूखे के मद्देनज़र से भी अधिक तृप्तिकर और तिक्त निराशा के भाव से भी अधिक पीड़ाहारी। 
कठिन जीवन-शक्ति है। प्राण की जिजीविषा को पुष्टिकर करता है, जीवन-विघ्नों की निवृत्ति का कठिन जीवनाधार है। 
प्राण की आतप को शीतल करता है, टूटते हृदयों को सहारा देता है। 
यह पूर्वतानी हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों से, वहीं कहीं भगवती महादेव सगाई लगाए बैठे होंगे; 
नीचे सपाट परतीली ज़मीं पसरी हुई है, किन्तु जहाँ-तहाँ जीवनतंतुश्री सरिताएँ आगे बढ़ने का मार्ग खोज रही होंगी – 
वहीं वह झरना ऊबड़-खाबड़ ज़मीन में – सूखी, नीर, कठोर। 
यहीं आकर आसीन मानकर बैठे हैं मेरे परिचारक दोस्त कुत्ज। 
 

विस्थापन से पूर्व वे कैसे परिवेश में रहते होंगे, किस तरह की ज़िंदगी बिताते होंगे, इसका दृश्य अपने स्वच्छ, पवित्र खुलपन में पहली बार अमसर गाँव में देखने को मिला। 
पेड़ों के घने झुरमुट, साफ-सुथरे खपरैल लगी मिट्टी के झोंपड़े और पानी। 
चारों तरफ़ पानी। 
अगर मोटर-रोड की भागती बस की खिड़की से देखा, तो लोगों जैसे सपनों में डूबा झील है, एक अंतहीन सागर, जिसमें पेड़, झोंपड़े, आदमी, ढोर-डंगर आधे पानी में, आधे ऊपर तिरते दिखाई देते हैं, मानो किसी बाढ़ में सब कुछ डूब गया हो, पानी में जम गया हो। 
फिर यह सच है... यह बाढ़ नहीं, पानी में डूबे बान के खेत हैं। 
अगर बस थोड़ी सी हिम्मत दिखाकर गाँव के भीतर चले, तब वे औरतें दिखाई देंगी जो एक पांत में झुकी हुई धान के पौधे छप-छप पानी में रोप रही हैं। 
 

ये लोग आधुनिक भारत के नए ‘शरणार्थी’ हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपने घर-ज़मीन से 
उखाड़कर हमेशा के लिए विस्थापित कर दिया है। 
प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है। 
बाढ़ या भूकंप के कारण जो लोग एक बार अपने स्थान से बाहर निकलते हैं, वे जब स्थिति टलती है तो वे दोबारा अपने 
जन्म-भूमीय परिवेश में लौट भी आते हैं। 
किन्तु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को जड़मूल सहित उखाड़ता है, तो वे अपनी ज़मीन पर 
वापस नहीं लौट पाते। 
उनका विस्थापन एक स्थायी विस्थापन बन जाता है। 
ऐसे लोग न सिर्फ भौगोलिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी नहीं उखड़ते, बल्कि उसका सामाजिक और 
आवासीय स्तर भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।